क्यूँ बच्चे की जिज्ञासा हमें आकर्षित करती है
एक छोटे बच्चे की आँखों में असीमित जिज्ञासा होती है, जो उसे अपने आस-पास की दुनिया को समझने के लिए प्रेरित करती है। उस दृश्य में, बच्चा सामान्यता से दूर, एक नई दुनिया की खोज में खोया हुआ लगता है। उसके चेहरे पर मासूमियत और ध्यान की गहराई को देखकर हमें यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि कैसे एक साधारण क्षण में भी जटिल जैविक व्यवहार विकसित होते हैं।
शोधकर्ताओं के अनुसार, बच्चे के मस्तिष्क में रोज़ नई कनेक्शन बनते हैं, जो उसके विकास की प्रक्रिया को तेज़ बनाते हैं। यह प्रक्रिया यह दर्शाती है कि बच्चे का मस्तिष्क केवल जानकारी इकट्ठा करने वाला नहीं, बल्कि उसे व्याख्या करने वाला भी होता है। जब बच्चा किसी वस्तु की ओर देखता है, तो वह न केवल उसकी उपस्थिति को समझता है, बल्कि उस पर अपने विचारों और भावनाओं को भी जोड़ता है। यह प्रयोगात्मक अध्ययन हमें यह बताता है कि जैविक व्यवहार कैसे अनजाने में भी विकासशील होता है।
दिलचस्प बात यह है कि बच्चों में एक सामान्य प्रवृत्ति होती है—सोचने की। दरअसल, छोटे बच्चे संरचनाओं और नियमों की खोज में खुद को लगा देते हैं। यह उनके विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे अपने अनुभवों के आधार पर नई जानकारियों का निर्माण करते हैं। जल्द ही, जब वह छोटे-छोटे निर्णय लेने लगते हैं, तो उनके पर्यवेक्षकों के लिए यह देखना एक शानदार क्षण होता है।
इस प्रक्रिया में, एक साधारण गतिविधि जैसे बर्तन के चारों ओर घूमने या खिलौने को उठाने से लेकर रचनात्मकता और समस्या समाधान की विधियाँ विकसित होती हैं। अध्ययनों से पता चला है कि बच्चों के मस्तिष्क में 90% वृद्धि वयस्कता की ओर बढ़ाते समय होती है, जो लगभग 3 साल की उम्र में पूरी होती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह शुरुआती चरण वास्तव में उनके जैविक व्यवहार के लिए एक ठोस आधार तैयार करते हैं।
इस प्रकार, यह कहना गलत नहीं होगा कि बच्चों की जिज्ञासा और उनके मस्तिष्क की विकासशीलता केवल उनके भविष्य को ही नहीं, बल्कि हमारे समाज की रचनात्मकता को भी प्रभावित करती है। हर टुकड़ा ज्ञान का एक नया द्वार खोलता है, और यह प्रक्रिया जीवन की अद्भुत यात्रा का हिस्सा बन जाती है।