एक छोटी सी दुनिया में बड़े सवाल
जब हम एक छोटे बच्चे की मासूमियत पर नज़र डालते हैं, तो हम सहजता से उनकी जिज्ञासा और जीवन के प्रति उत्साह को महसूस कर सकते हैं। वे नए अनुभवों की खोज में लगे होते हैं, जैसे कि खिलौनों के आकार और रंग, या हवा में उड़ते टॉमी या चिड़ियों की आवाज़ें। इस रुझान को समझना सरल नहीं है, लेकिन मनोवैज्ञानिक व्यवहारज्ञ इसे "आवश्यकता का विकास" कहते हैं। बचपन में, विशेषकर एक से तीन साल के बीच, बच्चे अपनी संवेदी क्षमताओं को इस्तेमाल कर क्रियाकलापों के प्रति प्रतिक्रिया करना सीखते हैं।
बजाय इसके कि बड़े वयस्क सोचे-समझे तरीके से आउटकम्स की योजना बनाएं, बच्चे इंद्रियों के माध्यम से सीखते हैं और प्रयोग करते हैं। उदाहरण के लिए, एक बच्चा जो अपनी छोटी उंगलियों से बटन दबाता है, वह न केवल खेल रहा है बल्कि अपनी मांसपेशियों और समन्वय क्षमता का विकास भी कर रहा है। यह प्रक्रिया उनके शरीर की शारीरिक बनावट और तंत्रिका तंत्र को मजबूत करती है, जो बाद में जीवन के और भी जटिल कौशल को सीखने में मदद करती है।
दिलचस्प बात यह है कि बच्चों में खुफिया का स्तर उनकी सामाजिक अध्यादेशों और पर्यावरण के अनुमति से बढ़ता है। जैसे-जैसे वे बाहर दुनिया का सामना करते हैं, उनकी सामाजिक रिफ्लेक्सेज़ और संवाद कौशलों में वृद्धि होती है। वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि इस विकास में करीब 85% मस्तिष्क संरचना पहले पाँच वर्षों में विकसित होती है, जो यह दर्शाता है कि शैशवावस्था का समय कितना महत्वपूर्ण है।
अंततः, जब हम किसी बच्चे की इन खोजों और उद्दीपनाओं को देखते हैं, तो हमें एहसास होता है कि यह केवल आनंद का अनुभव नहीं है, बल्कि एक वैज्ञानिक प्रक्रिया का हिस्सा है जो हमारे जीवन के प्रारंभिक चरणों में शुरू होती है। इस उम्र में बच्चे अपने जीवन के लगभग 80% अनुभव सीधे तौर पर खेल और प्रयोग के माध्यम से प्राप्त करते हैं। इसीलिए, उन्हें स्वतंत्रता देने से न सिर्फ उनकी भलाई बढ़ती है, बल्कि यह भविष्य के विकास के लिए भी अनिवार्य है।