नवजात शिशुओं की हरकतें और उनकी सहजता जीवविज्ञान के दृष्टिकोण से अत्यंत ऐतिहासिक होती हैं। जब हम एक छोटे से बच्चे के पैरों को देखते हैं, तो यह दृश्य न केवल प्यारा होता है, बल्कि इसमें कई महत्वपूर्ण बायोलॉजिकल व्यवहार भी छिपे होते हैं। जैसे-जैसे बच्चा बढ़ता
शिशु के नितंबों से निकलती हर हलचल, एक छोटे से तंत्रिका के नेटवर्क का कार्य है जो विकासशील मस्तिष्क के साथ तादामेल बनाता है। शिशु स्वाभाविक रूप से अपने पैरों को हिलाते हैं, यह न केवल उनके लिए मनोरंजन है, बल्कि यह मांसपेशियों की ताकत को भी विकसित करता है। वैज्ञानिक इस प्रक्रिया को "मोटर विकास" कहते हैं, जिसमें शिशु की मांसपेशियां, नींद से जागृत होकर, नई गति विकसित करने का प्रयास करती हैं।
यहाँ एक दिलचस्प बात यह है कि नवजात शिशु को पढ़ने की आवश्यकता नहीं होती है, वे स्वाभाविक रूप से इन गतिविधियों में लिप्त होते हैं। उनका पैरों को चलाना और मचलाना यह दर्शाता है कि वे अपनी पहचान बना रहे हैं और अपनी सीमाओं को समझ रहे हैं। यह प्रक्रिया बच्चे के मानसिक विकास को भी समर्थन देती है, जैसा कि शोध में पाया गया है कि शिशु की गतिविधियों का उनके सीखने की क्षमता पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि इस उम्र में, शिशु अपने पैरों का उपयोग करते हुए नया सबक ग्रहण कर रहे हैं। यह अद्वितीय अवस्था मस्तिष्क विकास का संकेत देती है। उस परिप्रेक्ष्य में, इस तरह की गतिविधियों में काफी अधिक वैज्ञानिक महत्व है। आंकड़ों के अनुसार, यह सिद्ध हुआ है कि शिशु के पहले दो साल में, मस्तिष्क का लगभग 80% विकास हो जाता है, जिसमें हाथ और पैरों की गतिविधियों का खास योगदान होता है।
नवजात शिशु की इस अद्भुत यात्रा के पीछे छिपी बायोलॉजिकल प्रक्रियाएँ हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि जीवन के सबसे सरल क्षण भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण से कितने गहरे और महत्वपूर्ण हैं।