बच्चों के खेलों में संज्ञानात्मक विकास की एक झलक
एक सरल दृश्य, लेकिन अंतर्निहित जटिलता से भरा हुआ। एक छोटा बच्चा रंगीन ब्लॉकों के साथ खेल रहा है, जो उसकी क्यूरीओसिटी और मौलिकता का प्रतीक है। इन ब्लॉकों को संतुलित करने की कोशिश करते हुए, वह न केवल खेल रहा है, बल्कि अपने चारों ओर के भौतिक संसार के नियमों को भी समझने की कोशिश कर रहा है। जब हम उनके दृष्टिकोण से देखते हैं, तो हमें उनकी मानसिक प्रक्रियाओं का एक अद्भुत उदाहरण मिलता है, जिसे हम अभी तक पूरी तरह से समझ नहीं पाए हैं।
शोध से पता चला है कि ऐसे खेलों से बच्चों में समस्या हल करने की क्षमता विकसित होती है। जब वह एक ब्लॉक को ऊपर उठाता है और उसे संतुलित करने की कोशिश करता है, तो यह न केवल उनके मोटर कौशल को बढ़ाता है, बल्कि उनके सोचने के तरीकों को भी चुनौती देता है। यह प्रक्रिया, जिसे हम अक्सर एक साधारण गतिविधि मानते हैं, वास्तव में उनके दिमाग के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
हर बार जब ब्लॉक गिरता है, बच्चे का मस्तिष्क सीखता है — सीखता है कि पुनर्व्यवस्था, संतुलन और धीरज का क्या महत्व है। यह एक असाधारण बात है कि किस प्रकार छोटे बच्चे जो केवल कुछ वर्षों से ही इस संसार का अनुभव कर रहे हैं, वह अभ्यस्त होते जा रहे हैं ऐसे अनुभवों से। यह प्रक्रिया अनायास ही उन्हें जटिल धारणाओं को समझने और जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार कर रही है।
एक छोटे बच्चे के खेल का यह दृश्य हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि हर गिरावट, हर असफलता, वास्तव में एक सीखने का अवसर है। मनुष्य जीवन का यह एक आंकड़ाचक रूप 3 से 4 साल की उम्र में हिट क्रिटिकल युथ डेवलपमेंट के फेज़ पर धीरे-धीरे आकार लेता है। इसी प्रक्रिया में, बच्चे अपने आसपास की दुनिया से जुड़ते हैं और इसकी बुनियादी संरचना को समझने लगते हैं। इस चरण में ही बच्चे 70% से अधिक जानकारी अपने अनुभव से प्राप्त करते हैं, जो उनके आने वाले जीवन पर गहरा असर डालता है।