जीवन के भ्रूण विकास की अनूठी प्रक्रिया
जब माता-पिता अपने नवजात शिशु को हाथों में उठाते हैं, तो यह केवल एक क्षण नहीं, बल्कि जीवन के कई पहलुओं का परिचायक होता है। शिशु के जन्म के साथ एक नई रिश्तेदारी का आरंभ होता है, जो न केवल जैविक बल्कि भावनात्मक रूप से भी गहराई से जुड़ी होती है। यह रिश्तार्डर अपने में एक साइकोलॉजिकल यथार्थ को समेटे हुए है, जहां माता-पिता का स्नेह और देखभाल शिशु के मानसिक और शारीरिक विकास में सहायक सिद्ध होती है।
शिशु जन्म के पहले घंटों में अपनी मां की आवाज़ और गर्माहट को पहचानने की क्षमता रखता है। यह न केवल एक अद्वितीय तथ्य है, बल्कि यह दर्शाता है कि शिशु के मन में जीवन के पहले पल से ही उसके आस-पास के दुनिया को समझने की कोशिश होती है। एक विज्ञान के दृष्टिकोण से देखें तो, एक नवजात लगभग 80% समय सोता है, और इस दौरान उसका मस्तिष्क कनेक्शन बनाता रहता है, जो अन्य जीवों की तुलना में कहीं अधिक तीव्रता से होता है।
इस स्नेह भरे क्षण में, परिवार की एकता और माता-पिता का समर्पण, शिशु के भविष्य की नींव रखते हैं। रिसर्च के अनुसार, ऐसे परिवारों में जो अपने बच्चों के साथ भावनात्मक और शारीरिक संपर्क बढ़ाते हैं, उन बच्चों में सामाजिक कौशल और भावनात्मक बुद्धिमत्ता का विकास अधिक होता है।
जब हम सोचते हैं, कि एक साधारण पल में कितनी गहराइयां छिपी होती हैं, तब यह समझ में आता है कि यह रिश्ता केवल व्यक्तिगत ही नहीं, बल्कि एक जैविक और सामाजिक प्रक्रिया का भी परिणाम है। जीवन के इस नाज़ुक स्तंभ में, जहाँ शिशु अस्पताल के बाहर निकल रहा होता है, वहाँ एक माइनर आँकड़ा भी महत्वपूर्ण होता है कि माताओं का 80% शिशु को अपने पहले साल में बढ़िया देखभाल देने में सफल रहते हैं। ऐसा लगता है कि यह रिश्ता हम सभी के लिए संवेदनात्मक दृष्टिकोण से न केवल प्रेरणा देता है, बल्कि मनुष्य के संवेदनशील और सहयोगात्मक दृष्टिकोण का भी विस्तार करता है।