मंदिरों में प्राचीन मूर्तियों का संबंध केवल धार्मिक आस्था से नहीं, बल्कि जीवों के व्यवहार पर भी एक दिलचस्प दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। इस तस्वीर में, काले पत्थर की बनी एक शेर जैसी आकृति आस-पास की लाल पूजा की धागों से सजाई गई है। यह एक ऐसी सांस्कृतिक परंपरा
इस तरह की मूर्तियों की रचना में न केवल कला का प्रदर्शन होता है, बल्कि यह उस समाज के जीववैज्ञानिक व्यवहार को दर्शाता है जहां वे उत्पन्न हुए। प्रारंभिक मानव समूहों ने शक्तिशाली जानवरों जैसे शेर या बाघ को पूजा का केंद्र बनाया, शायद इसलिए कि इन जीवों की शक्ति और साहस ने मानव विकास पर एक गहरा प्रभाव डाला। इन मूर्तियों के पीछे का तर्क यही है कि जब हम एक जीव को आदर्श बनाते हैं, तब हम उस विशेष गुण को अपने जीवन में समाहित करने का प्रयास करते हैं।
जीवों का यह व्यवहार इस बात से भी जुड़ा है कि कैसे उनके जीवन के प्रतीक हमारे दिमाग में गहरे बैठ जाते हैं। विज्ञान ने साबित किया है कि मनुष्यों में अन्य जीवों से प्रेरणा लेने की प्रवृत्ति नैतिकता और सामाजिक संबद्धता को बढ़ावा देती है। उदाहरण के लिए, जब लोग इन मूर्तियों के सामने प्रार्थना करते हैं, तो यह न केवल आस्था की बात है, बल्कि एक सामाजिक प्रतिज्ञा भी है कि हम साहस और ताकत की आवश्यकताओं को जानेंगे।
यदि हम संख्याओं की बात करें, तो दुनिया भर में लगभग 80% मानव समाज किसी न किसी रूप में धार्मिक या आध्यात्मिक प्रतीकों से जुड़े हुए हैं। यही बात खास बनाती है, कि मानवता का यह व्यवहार हमारे सामाजिक विकास और अस्तित्व में कितना महत्त्वपूर्ण है। जीवन के रोज़मर्रा के पहलुओं में यह आतिथ्य और सुरक्षा का अहसास दिलाता है, जो जीवों के प्रति हमारे स्नेह और सम्मान का एक अद्भुत उदाहरण है।